मिथिला मे विजयदशमी के दिन " नीलकंठ " चिरै के देखबाक परम्परा की कहैत अछि?

विजयादशमी के प्रतीकात्मक उत्सव।

मिथिला मे विजयदशमी के दिन " नीलकंठ " चिरै के देखबाक परम्परा की कहैत अछि? हम एकटा अनुमान लगबैत छी ।

शिव नीलकंठ छथि आ नीलकंठ चिरै ओकरे प्रतीकात्मक प्रत्यक्ष स्वरुप अछि। त्रिमूर्ति मे शिव (महेश) के विभिन्न महात्म्य छनि।
ओ शीघ्र प्रसन्न होइत छथि, अमरता के वरदान ओएह दय सकैत छथि। शिव-पार्वती आदर्श दम्पति छथि।सब वर्ण के आराध्य छथि। संहारक छथि, महायोगी छथि, नटराज छथि। इत्यादि -इत्यादि, अनेकानेक हुनकर वर्णन आ हुनका पर शोधकार्य अछि।

(डॉ० शैलेंद्र मोहन झा जिक फेसबुक वॉल स साभार)

मिथिला - संस्कृति मे शिव आ सिया के सासुर मे शिव , एकरुप होइतहुं, विविध रुप मे स्मरण कयल जाइत छथि।
मिथिला के शिव , विद्यापति के शिव , नचारी आ महेशवाणी के शिव, तंत्रवादी मिथिला के मशानसेवी शिव भिन्न छथि कापालिक शिव, कालमुख शिव, शिश्नदेवा, कल्याणसुंदर, दक्षिणामूर्ति आ लकुटिश सं ।कथा अलग, महात्म्य अलग। पौराणिक शिव आ वैदिक रुद्र के प्रतीकात्मक प्रस्तुति भिन्न अछि। मिथकीय वर्णन , सहस्त्रनाम शिव के भिन्न-भिन्न अछि। मूर्ति रुप मे शिव , विभिन्न क्षेत्र में भिन्न -भिन्न छथि।
 तथापि, किछु वर्णन सर्वक्षेत्रीय -सर्वकालिक अछि। की नीलकंठ के दर्शन , नीलकंठधारी शिव के प्रसन्न करबाक कामना अछि? नीलकंठ स्वरूपधारी शिव गरल के धारण कयलनि, अर्थात् गरल के प्रभाव सं चराचर सृष्टि के रक्षा कयलनि । मृत्यु अवश्यंभावी अछि, तखन गरल साधन अछि मृत्यु के , जेकर अधीष्ट छथि शिव , तात्पर्य , गरल के नियंत्रण आ प्रयोग शिव कोनो नियमानुसार करैत हेताह। संभवतः जकरा हम सब अकालमृत्यु बुझैत छियैक, ओहि सं रक्षा , शिव करताह, से अनुमित अछि। यदि नीलकंठ शिव , मैथिल के अकालमृत्यु सं बचवैत छथिन, तखन दीर्घजीवन पाबि कय, की कामना रहत? आदर्श दाम्पत्य जीवन यापन करी। कष्ट मुक्त जीवन होअय।
एहि अभीष्ट लेल कोन उपाय, नीलकंठ के दर्शन के परम्परा। ई नीलकंठ दर्शन परम्परा सब लेल अछि, वर्णविशेष लेल नहि। एहि लेल घोर तपस्या के प्रावधान नहि अछि।सहज रुपें विजयादशमी दिन नीलकंठ के दर्शन करु, नीलकंठ महादेव प्रसन्न हेताह। सर्वव्यापी मृत्यु आ देहधारी कष्ट के निवारणार्थ, सहज समाधान अछि, नीलकंठ दर्शन।ई एकटा भक्ति- परम्परा भेल मिथिला के ।

आब दोसर परम्परा देखू , सिया के सासुर के । रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण, महिषासुर से हो, सब घोर, परम तप कयलनि शिव के प्रसन्न करबाक लेल। दीर्घकालिक कठिन, दुस्साध्य तपश्चर्या सं शिव की वरदान देलखिन चारु तपस्वी के ? सबके बुझल अछि। मात्र मेघनाद के वरदान के उदाहरण देब । ओ शिव सहित , त्रिमूर्ति के घोर तपस्या सं प्रसन्न कय , पाशुपत, ब्रह्मास्त्र आ सुदर्शन चक्र प्राप्त कयने छल, जेना मिथकीय वर्णन अछि। महिषासुर अमरता के वरदान चाहैत छल, शुक्राचार्य जकां , मुदा शिव ओकरा वरदान देलखिन, शाश्वत मृत्यु -वरण करबाक लेल , मनोवांछित रुप के वरदान, मृत्यु कोना होअय, महिषासुर के ई विकल्प चुनबाक वरदान भेटलय। तहिना रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण, सबके वरदान प्राप्त भेलनि कठिन तपस्या के बाद । मृत्यु सं मुक्ति वा अमरता के वरदान किनको नहि भेटलनि। तखन नीलकंठ चिरै दर्शनक की महत्ता? अमरता के कामना , कष्टमुक्त, गरल(कष्ट) मुक्त जीवन -यापन के अभीप्सा।

सिया -सासुर मे रावण-दहन के परम्परा की बतवैत अछि? प्राप्त वरदान के दुरुपयोग कयलक रावण। मुदा वरदान -प्राप्ति लेल कयल गेल घोर तपस्या गौण भ' गेल। शिव-प्रसन्न भेलाह ओकर तपस्या सं, ई अननुकरणीय भ' गेल । स्मरण की कयल जाइत रहल ? वरदान मे प्राप्त शक्ति के दुरुपयोग के खिस्सा । ध्यातव्य अछि जे वानरराज बालि ई बात कहने छल जे सियासासुरक नियम -कानून ओतहि लेल अछि, वनप्रदेश लेल नहि। बालि से हो सुग्रीव -पत्नी के बलात् अपहरण कयने छल , जकर न्याय करय आयल छलाह सियापति। रावण से हो यैह अपराध कयने छल आ सियापति दंडस्वरूप ओकर वध कयलनि। 

की क्षेत्रीय परम्परा, भौगोलिक विधि-विविधता, काल-स्थान-पात्र भेद , सबटा निर्रथक अछि। सियासासुरक नियमावली सार्वभौम बनि गेल? की आइयो वर्चस्ववादी संस्कृति के एहिना अपन सांस्कृतिक आचार -विचार आरोपित करबाक ओहने अधिकार छै ?हम जनपदीय मगध सं साम्राज्यवादी मगध पर शोध कयने छी। वर्चस्ववादी अनेक आयाम छल, अर्धमागधी लिपि, कर-प्रणाली, सैनिक -संगठन, मुद्रा -अर्थव्यवस्था , इत्यादि । ताहि मे सं मुद्रा -अर्थव्यवस्था पर विस्तृत पुरातात्विक प्रमाण सं ई निष्कर्ष निकलल छल जे मगध के कार्षापण मुद्रा -प्रणाली अखिल भारतीय मुद्रा -अर्थव्यवस्था बनि गेल ।यैह छल वर्चस्ववादी संस्कृति के विस्तार ।तखन ई विचारणीय अछि जे कोनो परम्परा के रुप आ उद्देश्य की अछि , ककर हित-साधक अछि सायाश संरक्षित परम्परा? 

एहि बेर के साहित्य क नोबल पुरस्कार कथी लेल देल गेल अछि? एहि वर्चस्ववादी पुरुषवादी त्रासदी के विरुद्ध। हुनकर साहित्य मे एहि मिथ के तोड़बाक मार्मिक वर्णन अछि जे कोना वर्चस्ववादी आचरण , कष्टदायक अछि, ओ आचरण चाहे, भोजन सं जुड़ल होअय( the vegitarian) , वा स्त्री -देह सं ।यातना सं मुक्ति के खिस्सा अछि , जकरा प्रेरणास्पद मानैत, अनुकरणीय बुझैत , सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान देल गेल। 

रावण-दहन, नीलकंठ दर्शन आ साहित्य के नोबल पुरस्कार, तीनू के जोड़ि देखल जाय -एकसूत्रता मे की निष्कर्ष निकलैत अछि ? कोन परम्परा संरक्षित कयल जाइत अछि आ ककर वर्गहित में? प्रतीकात्मक आचरण के पाछां कोन उद्दीष्ट, आवरण मे अछि? 

रावण -मेघनाद, महिषासुर जकां तपस्या , शिव के प्रसन्न करबाक लेल काम्य भ' सकैत अछि, मुदा प्रसन्न शिव सं की वरदान मांगब आ ओहि वरदान के स्वान्त:सुखाय लेल वा सृष्टि कल्याणार्थ उपयोग करब, ई ज्ञान महत्वपूर्ण अछि। तैं वेदवादी कर्मवादी सं उत्कृष्ट भ' गेल ज्ञान- मूलक उपनिषद्। अपन ज्ञान -प्राण, बुद्धि -विवेक सं अर्चित शक्ति के समष्टि लेल उपयोग करब , यैह निष्कर्ष अछि आजुक विमर्श के। मोक्ष व्यक्तिगत अछि, मुदा जीवन सार्वजनिक होअय। 
धन्यवाद।

पोस्ट साभार: 
डा.शैलेन्द्र मोहन झा,
दिल्ली विश्वविद्यालय, 
विजयादशमी, २०२४.