मिथिलाक गर्म मौसम पर एक कविता

किछू दिन स अपन मिथिला में खूब घाम ( गर्मी ) पैर रहल अइछ। गर्मीक मौसम, जीव जन्तु, प्रकृति और धराधर निर्माण कार्य पर केन्द्रित अनिता मिश्रा जी कऽ कविता पढ़ल जाऊ।


पन्द्रह दिन सय झुलसि रहल
 ‌ ‌‌छल अपन मिथिला धाम
अग्नि ज्वाला सरीख धूप
     ‌ टप टप चुबै घाम
तबा समान तपै धरती
       पैर धरति निकलै जान।।
चिरै चुन मुनि प्यासे व्याकुल
  ‌‌ हलक में एलै प्राण।।
कुंलर पंखा काज ने करै
       घर बनल भट्टी समान
त्राहि त्राहि सब पुकारै बरखा दियौ राम
अचानक आई फुंही परलै
        सिहकल वायु प्राण।।
छन सय उठल धरा पटल पर
धूल संग धरती लेलनि सांस।।
   करबट लेलक मुरझायल लती
‌ ‌गाछ में हिलय लागल आम।।
बूंद पिबि पात मुस्कायल 
धूभि में आयल जान।।
प्रदूषण संग गरमी बढैया
            कोना कय बचतै प्राण।।
खेती करियौ गाछ वृक्ष लगबियौ 
केवल ने बनबियौ मकान।।

    ‌‌ ‌लेखिका अनीता मिश्रा